मैं लिखता हूँ खताओं पे सजा पर नहीं लिखता
मेरी उंगली हैं चरागों पे, मैं हवा पर नहीं लिखता
मैं महक लिखा करता हूँ मिटटी के घरों की
तेरे शहर के शीशों के मकाँ पर नहीं लिखता
मैं लिखता हूँ गुरबतों पे फाकाकशी पे रोज
किसी महजबीं के हुस्न-ओ-अदा पर नहीं लिखता
मशहूर है दुनिया में यूँ तो आजिजी मेरी
पर सच को कभी सर मैं झुकाकर नहीं लिखता
मेरी आदत हैं मैं लिखता हूँ अपने निगहबान पर
रहजन पे मैं सब कुछ भी लुटा कर नहीं लिखता
लिखता हूँ मैं इस शहर के हर एक खुदा पर
पर यारों मैं सचमुच के खुदा पर नहीं लिखता
मैं दिल में किया करता हूँ बस जिक्रे खुदाई
मंदिर पे या मस्जिद की अजां पर नहीं लिखता
मैं लिखा करता हूँ हर रोज मुन्सिफ की कलम पर
कातिल के कभी झूठे बयां पर नहीं लिखता
लिख लेता हूँ मैं ऐब हुनर अपने ही अयान
पर अपने बुजुर्गों की जबाँ पर नहीं लिखता.................Dr.Rohit "AYAAN"
Sunday, January 23, 2011
महोब्बत की मेरे यारब मुझे ऐसी सजा देना
वो बन जाये कोई मूरत मुझे मीरा बना देना
मैं बैठा हूँ लिए हाथों में तेरे इश्क का प्याला
ज़हर देना भले ही आज तू कोई दवा देना
समझते ही नहीं हैं दिल की धड़कन को खिरद वाले
इन्हें कुछ अब मेरे मौला अक्ल के भी सिवा देना
बहुत हलचल हैं तूफाँ में कही ये लौ ना बुझ जाये
जलाये जो चरागों को, कोई ऐसी हवा देना.................. Dr.Rohit "AYAAN"
वो बन जाये कोई मूरत मुझे मीरा बना देना
मैं बैठा हूँ लिए हाथों में तेरे इश्क का प्याला
ज़हर देना भले ही आज तू कोई दवा देना
समझते ही नहीं हैं दिल की धड़कन को खिरद वाले
इन्हें कुछ अब मेरे मौला अक्ल के भी सिवा देना
बहुत हलचल हैं तूफाँ में कही ये लौ ना बुझ जाये
जलाये जो चरागों को, कोई ऐसी हवा देना.................. Dr.Rohit "AYAAN"
बहुत दिनों में आज उसका हैं पयाम आया
गुजर गये जब उसके लब पे मेरा नाम आया
निकलते कैसे अयान उसकी मीठी यादों से
दुखाने दिल को वो हर सुबह हर शाम आया
ना दे सका था कल मुकद्दर जो मेरा मुझको
आज क्यूँ देने वो दुनिया का हैं निजाम आया
नाम लिख लेना शमा उसका दिलजलों में तू
आज मरने तेरे दर पे हैं "अयान" आया.................Dr.Rohit "AYAAN"
गुजर गये जब उसके लब पे मेरा नाम आया
निकलते कैसे अयान उसकी मीठी यादों से
दुखाने दिल को वो हर सुबह हर शाम आया
ना दे सका था कल मुकद्दर जो मेरा मुझको
आज क्यूँ देने वो दुनिया का हैं निजाम आया
नाम लिख लेना शमा उसका दिलजलों में तू
आज मरने तेरे दर पे हैं "अयान" आया.................Dr.Rohit "AYAAN"
Monday, February 22, 2010
वो जब से मेरे खवाबों में आना नहीं भूले
पलकों पे हम भी ख्वाब सजाना नहीं भूले
भूले हो दोस्तों को दिल्लगी की बात पर
तुम दिल मे क्यूँ दीवार उठाना नहीं भूले
सोचा है दोष क्या दे अब नाखुदा को हम
मेहरबाँ ही जब तूफ़ान उठाना नहीं भूले
ना कर हक़-ए-बयान तू हर एक के सामने
दुनिया मे सभी ज़हर पिलाना नहीं भूले
रख कर के फूल को "अयान" मेरी कब्र पर
वो आज भी एहसान जताना नहीं भूले....................Dr.Rohit "AYAAN"
पलकों पे हम भी ख्वाब सजाना नहीं भूले
भूले हो दोस्तों को दिल्लगी की बात पर
तुम दिल मे क्यूँ दीवार उठाना नहीं भूले
सोचा है दोष क्या दे अब नाखुदा को हम
मेहरबाँ ही जब तूफ़ान उठाना नहीं भूले
ना कर हक़-ए-बयान तू हर एक के सामने
दुनिया मे सभी ज़हर पिलाना नहीं भूले
रख कर के फूल को "अयान" मेरी कब्र पर
वो आज भी एहसान जताना नहीं भूले....................Dr.Rohit "AYAAN"
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