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Sunday, January 23, 2011

मैं लिखता हूँ खताओं पे सजा पर नहीं लिखता
मेरी उंगली हैं चरागों पे, मैं हवा पर नहीं लिखता

मैं महक लिखा करता हूँ मिटटी के घरों की
तेरे शहर के शीशों के मकाँ पर नहीं लिखता

मैं लिखता हूँ गुरबतों पे फाकाकशी पे रोज
किसी महजबीं के हुस्न-ओ-अदा पर नहीं लिखता

मशहूर है दुनिया में यूँ तो आजिजी मेरी
पर सच को कभी सर मैं झुकाकर नहीं लिखता

मेरी आदत हैं मैं लिखता हूँ अपने निगहबान पर
रहजन पे मैं सब कुछ भी लुटा कर नहीं लिखता

लिखता हूँ मैं इस शहर के हर एक खुदा पर
पर यारों मैं सचमुच के खुदा पर नहीं लिखता

मैं दिल में किया करता हूँ बस जिक्रे खुदाई
मंदिर पे या मस्जिद की अजां पर नहीं लिखता

मैं लिखा करता हूँ हर रोज मुन्सिफ की कलम पर
कातिल के कभी झूठे बयां पर नहीं लिखता

लिख लेता हूँ मैं ऐब हुनर अपने ही अयान
पर अपने बुजुर्गों की जबाँ पर नहीं लिखता.................Dr.Rohit "AYAAN"
महोब्बत की मेरे यारब मुझे ऐसी सजा देना
वो बन जाये कोई मूरत मुझे मीरा बना देना

मैं बैठा हूँ लिए हाथों में तेरे इश्क का प्याला
ज़हर देना भले ही आज तू कोई दवा देना

समझते ही नहीं हैं दिल की धड़कन को खिरद वाले
इन्हें कुछ अब मेरे मौला अक्ल के भी सिवा देना

बहुत हलचल हैं तूफाँ में कही ये लौ ना बुझ जाये
जलाये जो चरागों को, कोई ऐसी हवा देना.................. Dr.Rohit "AYAAN"
बहुत दिनों में आज उसका हैं पयाम आया
गुजर गये जब उसके लब पे मेरा नाम आया

निकलते कैसे अयान उसकी मीठी यादों से
दुखाने दिल को वो हर सुबह हर शाम आया

ना दे सका था कल मुकद्दर जो मेरा मुझको
आज क्यूँ देने वो दुनिया का हैं निजाम आया

नाम लिख लेना शमा उसका दिलजलों में तू
आज मरने तेरे दर पे हैं "अयान" आया.................Dr.Rohit "AYAAN"